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Monday, February 8, 2010

जिंदगी कीसच्चाई को उजागर करती गजलें

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
डॉ. कृष्ण कुमार बेदिल का यह दूसरा गजल संग्रह हथेली पर सूरज मौजूदा दौर के आम आदमी के अंतर्मन की व्यथा, सामाजिक विसंगतियों, जिंदगी की तल्ख हकीकत, राजनीतिक विद्रूपताओं और नित बदल रहे जीवनमूल्यों से रू-ब-रू कराता है। हुस्न और मुहब्बत जैसे कोमल भावों को भी अभिव्यक्त करने का उनका अंदाज अलग है-'छुप के बादली में मुझे चांद चिढ़ाता क्या है, मैं अपने चांद को चिलमन में छोड़ आया हूं।Ó रिश्तों में आए बदलाव हों या आदमी की सोच में या फिर सामाजिक मान्यताओं में, वह बड़ी संजीदगी के साथ सभी को रेखांकित करते हैं और कुछ कड़वी हकीकत से भी रु-ब-रू कराते हैं। यथा-'तहजीब तो पश्चिम की हवाओं में बह गई, रिश्ते बदल रहे हैं जमाने के साथ-साथ। राजनेताओं के चरित्र और राजनीति में उपज रही विसंगतियों को भी वह प्रभावशाली तरीके से अभिव्यक्त करते हैं-'इन अंधेरों की सियासत से कहां डरते हैं, हम तो सूरज को हथेली पे लिए फिरते हैं। जो जमाने की मुहब्बत में हुए हैं कुरबान, ऐसे इन्सान जमाने में कहां मरते हैं। प्रभावशाली कथ्य, बेहतरीन शिल्प और गहन भाषिक संवेदना के चलते इस संग्रह का हर शेर पाठक के दिल पर अपनी छाप छोडऩे में कामयाब है। यह गजल संग्रह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भाषा की गंगा जमुनी संस्कृति को पुष्ट करता है। इसमें गजलों को आमने-सामने केपृष्ठों पर हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए दोनों भाषाओं के पाठकों के लिए यह उपयोगी है।
हथेली पर सूरज, शायर : डॉ. कृष्ण कुमार बेदिल प्रकाशक : निरुपमा प्रकाशन, मेरठ, मूल्य : १५० रुपये।

Friday, January 15, 2010

हिंदी काव्य साहित्य में शकुन-अपशकुन का अनुशीलन

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
भारतीय समाज में प्रारंभिक काल से शकुन अपशकुन की बड़ी मान्यता रही है। व्यापक समाज शकुनापशकुन का विचार करके ही अपने कार्यों का निष्पादन करता है। डॉ. परमात्मा शरण वत्स ने अपनी पुुस्तक शकुन-अपशकुन में हिंदी साहित्य की विविध कृतियों में इस विषय के प्रसंगों की विवेचना करते हुए शोधपरक दृष्टिकोण से इसकी महत्ता को रेखांकित किया है। उनकी मान्यता है कि दैवी शक्तियां विशिष्ट पशु-पक्षियों की गतिविधियों से भावी शुभ-अशुभ की सूचना प्रदान करती हैं। अंग स्फुरण, स्वप्न और नक्षत्रों आदि की गति के माध्यम से देवी शक्तियों की शुभ-अशुभ इच्छा का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। सात अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक में शकुनापशकुनों की व्याख्या, उत्पत्ति, विकास, महत्व तथा वर्गीकरण करके हिंदी काव्य में इनकी स्थापनाओं की विवेचना की गई है। काव्य साहित्य में पशु-पक्षी, कीटों, समाजिक जीवन, शारीरिक-मानसिक अवस्थाओं तथा स्वप्नादि से प्राप्त शकुनापशकुन का शोधपरक अनुशीलन किया गया है। कथानक, भाव योजना, रस योजना और परिस्थिति चित्रण की दृष्टि से भी इनका महत्व निरूपित किया गया है। उपसंहार में विभिन्न कालों में काव्य में शकुन-अपशकुन का तुलनात्मक अध्ययन और नई कविता में इनके प्रयोग की स्थिति और संभावनाओं पर भी विचार किया गया है। इस कृति की महत्ता इस तथ्य में निहित है कि विषय का तर्कसंगत प्रतिपादन व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण से किया गया है। हिंदी काव्य साहित्य केआदिकाल से लेकर आधुनिक युग तक की रचनाओं में शकुन विचार का विश्लेषण किया गया है। निसंदेह हिंदी काव्य साहित्य के अनुशीलन में डॉ. परमात्मा शरण वत्स की इस कृति की विशिष्ट महत्ता है।
शकुन-अपशकुन, लेखक : डॉ. परमात्मा शरण वत्स, प्रकाशक : अर्चना पब्लिकेशन्स, मेरठ, मूल्य : 500 रुपये।

Saturday, January 2, 2010

जीवन की त्रासदी से रू-ब-रू कराती गजलें

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
मौजूदा दौर की सामाजिक, राजनीतिक विसंगतियों, आम आदमी की संवेदना, दलित जीवन की त्रासदी, मानवीयता के क्षरण से उपजी स्थितियों को डॉ. राम गोपाल भारतीय ने अपने गजल संग्रह 'हाशिए के लोगÓ में बड़े प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। समाज के शोषित वर्ग की आवाज को गजलों में शब्दबद्ध करते हुए उन्होंने विराट संवेदना और मानवीय पीड़ा से साक्षात्कार कराया है। अनुभूति, अभिव्यक्ति और शिल्प के स्तर पर उनकी गजलें अपनी अलग पहचान बनाने में समर्थ हैं। शिल्प, प्रयोगधर्मिता, मुहावरों, प्रतीकों और बिम्बों के सार्थक प्रयोग से उनकी गजलों को प्रभावोत्पादकता बढ़ जाती है। बड़ी सहजता से वह गंभीर कथ्य को भी शब्दबद्ध कर देते हैं और कुछ सवाल खड़े करके ङ्क्षचतन के लिए भी प्रेरित करते हैं। यथा-'हजार साल से बैठे हैं दूर सूरज से, हमें भी धूप का हक है हुजूर सूरज से। ये कैसी रात है जिसकी सुबह नहीं होती, जवाब चाहिए हमको जरूर सूरज से।Ó राजनीतिक कुटिलता, भ्रष्टाचार और अनीति से त्रस्त होकर उनकी पीड़ा कुछ इस तरह मुखर हुई है- 'इस तरह से जश्ने आजादी मनाया जाएगा, मंच पर गूगों से अब भाषण कराया जाएगा।Ó समाज के शोषित वर्ग को कदम-कदम पर अपमान, तिरस्कार और कष्ट सहन करने होते हैं। इसके बावजूद वह आवाज उठाने में समर्थ नहीं हैं। उनकी इस स्थिति को ये पंक्तियां अभिव्यक्त करती हैं- 'ये बिचारे क्या कहेंगे, हाशिए के लोग हैं. चुप रहे हैं, चुप रहेंगे, हाशिए के लोग हैं।Ó सामाजिक मान्यताएं भौतिकवादी परिवेश में लगातार बदल रही हैं और उनके दुष्परिणामों पर कोई विचार नहीं कर रहा है। इसी से समाज में विसंगतियां भी बढ़ रही हैं। इसीलिए वह लिखते हैं-'कांटे अब गमलों में पाले जाएंगे, खुशबू वाले फूल निकाले जाएंगे।Ó वस्तुत: रामगोपाल भारतीय आधुनिक समाज में पनप रही विविध विडंबनाओं और आम आदमी की त्रासद स्थितियों और पीड़ादायक मनोदशाओं को शिल्प की दृष्टि से पुख्ता गजलों के माध्यम से उभारने में सफल रहे हैं।
हाशिए केलोग, डॉ. राम गोपाल भारतीय, प्रकाशक : कादम्बरी प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य : १५० रुपये।
(अमर उजाला, मेरठ के०१ जनवरी २०१० केअंक में प्रकाशित)

Friday, December 4, 2009

अनुभूति और संवेदना को जागृत करती कविताएं

- अशोक प्रियरंजन
गोविंद रस्तौगी की कविताएं मौजूदा समाज में पनप रही अपसंस्कृति, सामाजिक मूल्यों के क्षरण, भ्रष्टाचार, पतनशील राजनीति, जीवन में पनप रही निराशा, अकेलेपन, ऊब और भटकाव से साक्षात्कार कराती हैं । उनकी कविताओं में प्रखर आध्यात्मिक चेतना और गंभीर चिंतन की झलक मिलती है । वह मनुष्य की शुष्क होती संवेदनाओं, मानव मन की छटपटाहट को भी रेखांकित करते हैं- 'आंख में आकुल निमंत्रण, ओंठ पर सौजन्यताएं, कब कहां कैसे मिलेंगे, क्या कहें, हम क्या बताएं।Ó शहरी सभ्यता के खोखलेपन पर भी वह गहरा प्रहार करते हैं । यथा- 'लोहा, सीमेंट, ईंट के बढ़ते जंगल में, बीसवीं सदी ने अपने पांव पसार दिए।Ó उनकी कविताओं में प्रकृति, देशप्रेम, पौराणिक आख्यानों से संबंधित प्रसंग भी संपूर्ण गौरव केसाथ विद्यमान हैं । मजदूरों, किसानों और दबे-कुचले लोगों की वाणी को भी उन्होंने शब्दबद्ध किया है । प्रेम भावों और समर्पण को आध्यात्मिक चेतना से संपृक्त करके वह उसे चिंतनपरक बना देते हैं- 'सृष्टि में सौंदर्य की सत्ता समर्पण के लिए है, पंच तत्वों का समन्वय एक अर्पण केलिए है । देह, रस, स्वर, गंध, रूपम राग जीवन के लिए है, पंच भोगों का नियंत्रण आज इस क्षण केलिए है।Ó तमाम सुख सुविधाओं के बीच भी आज मानव मन छटपटा रहा है- 'कैसी कैसी घुटन ऊब छायी मन में, खोलो खोलो द्वार हवाएं आने दो।Ó कथ्य, विचार, भाव और शिल्प की दृष्टि से गोविंद रस्तोगी की कविताएं सहज ही हृदय पर अपनी छाप छोडऩे में समर्थ में है । उनकी कविताओं में विषय का गहन अनुशीलन और शोधपरक दृष्टि का सहज दर्शन होता है । सामाजिक चेतना, आध्यत्मिक प्रखरता और शिल्पगत प्रयोग उन्हें विशिष्ट कवि बनाते हैं। वस्तुत: गोविंद रस्तोगी की कविताएं अनुभूति और संवेदना केअद्भुत संसार से साक्षात्कार कराती हैं ।
हवाएं आने दो, कवि : गोविंद रस्तौगी, प्रकाशक : अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद, मूल्य : ३५० रुपये।

(अमर उजाला, मेरठ, के ०४ दिसंबर २००९ के अंक में प्रकाशित )

Saturday, November 28, 2009

जिंदगी की हकीकत से रूबरू कराती गजलें

-अशोक प्रियरंजन
उर्दू के साथ ही हिंदी में भी खास पहचान बनाने वाले शायर राम अवतार गुप्ता 'मुज्तरÓ की गजलें जिंदगी की हकीकत से रूबरू कराती हैं । 'सीपियों में समंदरÓ उनकी हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं की गजलों का संग्रह है जिसमें उन्होंने जहां सियासत और मौजूदा समाज में पनप रही विसंगतियों को रेखांकित किया है वहीं इश्क, मोहब्बत से जुड़ी कोमल भावनाओं को खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है । मौजूदा दौर की कड़वी हकीकत को वह कुछ इस तरह बयां करते हैं-'आड़ में अम्नो-अमां की हादसे बोए गए, रोशनी के वास्ते शोलों को भड़काया गया।Ó प्रेम भावना की बुलंदी को भी बड़ी गहराई से महसूस करके शब्दबद्ध करते है-'बोसा इक तूने हथेली पै मेरी क्या रक्खा, मैं जिधर हाथ उठाऊं तेरी खुशबू निकले।Ó वह संघर्ष करना जिंदगी की नियति मानते हंै-'जीवन की राहों में इन्सां गम से भागे भाग न पाए, शीश महल का पंछी जैसे टकरा-टकरा कर मर जाए।Ó मुज्तर की साफगोई, पुख्ता शायरी, बयान करने का अंदाज, हिंदी और उर्दू दोनों में प्रखर भाषिक संवेदना उन्हें उम्दा शायर के रूप में स्थापित करती है। उनकी सोच का फलक बहुत व्यापक है । जिंदगी और इससे जुड़ी विविध संवेदनाओं को उन्होंने बहुआयामी दृष्टिकोण से गजलों में उतारा है । इस नाते हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में राम अवतार गुप्ता और उनके इस गजल संग्रह का अहम मुकाम है।
सीपियों में समंदर, राम अवतार गुप्ता 'मुज्तरÓ, प्रकाशक : बेनजीर प्रिंटर्स, नजीबाबाद, मूल्य : १५० रुपये।

(अमर उजाला, मेरठ के २७ नवंबर २००९ केअंक में भी प्रकाशित)

Saturday, November 14, 2009

सूक्ष्म संवेदनाओं की अभिव्यक्ति

-अशोक प्रियरंजन
इस संग्रह की कविताओं में तीन कवियों ने आधुनिक जीवन की सूक्ष्म संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी है। निर्मल गुप्त की कविताएं कथ्य की सरलता, सहज शिल्प, बिम्ब, प्रतीक, नए मुहावरों के कारण ध्यान खींचती हैं । बड़ी कलात्मकता से उन्होंने मनुष्य और समाज में पनप रहे तनाव और जिंदगी के संघर्ष को रेखांकित किया है । 'नहाती हुई लड़की शीर्षक कविता में वह लिखते हैं- लड़की नहाती है/तो उसके पोर-पोर में समा जाते हैं असंख्य जल-बिंदु/ तब वह स्वत: ही मुक्त हो जाती है गुरुत्वाकर्षण से/ और चल देती है/ हजारों प्रकाश-वर्ष की अनंत यात्रा पर।Ó दूसरे कवि राजन स्वामी की कविताएं आम जिंदगी पर पनप रहे तनाव और सामाजिक मूल्यों के पतन की ओर संकेत करती है । नन्हीं बिटिया की डायरी से में वे लिखते हैं-'हे भगवान, अफसर की गलती हो या पापा की कुंठा, मार मैं ही खाती हूं, कभी कभी लगता है कि दफ्तर पापा नहीं, मैं जाती हूं ।Ó तीसरे कवि दीपक कुमार श्रीवास्तव मनुष्य के अंतद्र्वंद, सामाजिक विडंबनाओं, अकेलेपन और परिस्थितियों से उपजे तनाव को रेखांकित करते हैं । द्वंद्व में वह लिखते हैं-'दोहरी होती गई हर चीज, दोहरी होती जिंदगी के साथ। आस्थाएं, विश्वास, कर्तव्य, आत्मा और फिर उसकी आवाज।Ó सभी तीन कवियों की कविताएं कथ्य की नवीनता के कारण काफी आश्वस्त करती हैं ।
तीन, निर्मल गुप्त, राजन स्वामी, दीपक कुमार श्रीवास्तव : स्वर्ण-रामेश्वर पब्लिकेशन्स मेरठ, मूल्य : ५० रुपये।
(अमर उजाला, मेरठ के १३ नवंबर के अंक में प्रकाशित)