Friday, October 23, 2009

आईना दिखाती गजलें

-अशोक प्रियरंजन
कृष्ण कुमार 'बेदिलÓ की गजलें जिंदगी की तल्ख सचाईयों को बड़े बेलौस तरीके से उजागर करती हैं । आधुनिक समाज में व्याप्त विसंगतियों, इंसानियत के पतन, मनुष्य के दोहरे चरित्र और विविध कारणों से जिंदगी में पनप रही पीड़ा को उनके शेर बड़ी गहराई से रेखांकित करते हैं । मोम का घर में शामिल गजलें बदलतें समाज के लोगों को आईना दिखाकर उन्हें भविष्य के खतरों से भी सचेत करती हैं । 'चोंच में दाना दबाये है परिंद, उड़ रहा है भीगकर बरसात मेंÓ और 'मोम का एक घर बनाया है, धूप का आज उस पे साया हैÓ-जैसे शेर जिंदगी के संघर्ष को बड़ी बारीकी से परत दर परत खोलते हैं । उनकी गजलों के अनेक शेर राजनीतिक विसंगतियों, सामाजिक रुढिय़ों और मानवीय दुर्बलताओं पर कटाक्ष भी करते हैं और कई समसामायिक ज्वलंत प्रश्नों से साक्षात्कार कराते हैं । इन ८० गजलों में जिंदगी के रंग दिखाई देते हैं । गजलों की भाषिक संरचना में हिंदी और उर्दू के शब्द शामिल हैं और विषयवस्तु की अभिव्यक्ति बड़ी प्रखर है। बेहतरीन शिल्प, प्रभावशाली कथ्य और विविध विषयों के सामाजिक सरोकारों की व्यापक अभिव्यक्ति से यह संग्रह गजल परंपरा में अहम मुकाम बनाने की सामथ्र्य रखता है ।
मोम का घर, कृष्ण कुमार 'बेदिलÓ : महावीर एंड संस, नई दिल्ली, मूल्य : १५० रुपये ।
(अमर उजाला, मेरठ के २३ अक्तूबर के अंक में प्रकाशित )

Saturday, October 10, 2009

तन को बेचैन भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
मेरठ शहर का घनी आबादी वाला मुहल्ला है ब्रह्मपुरी । दिल्ली रोड के करीब बसे इसी मुहल्ले के मुख्य मार्ग पर है परशुराम हलवाई की दुकान, जिससे सटी गली में है हिंदी काव्य मंच के समर्थ गीतकार भारत भूषण का मकान । गली में घुसने पर जो पहला व्यक्ति मिला, उससे मैंने भारत भूषण का घर पूछा, तो सामने के एक मकान की ओर उसने तर्जनी से संकेत किया। काले रंग से रंगे गेट को खोला और वहां सफाई कर रही महिला से मैंने भारत जी के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि वह आ रहे हैं ।
पीछे मुड़ा, तो हाथ में थाली लिए भारत भूषण मंदिर से लौट रहे थे । कदमों में कुछ डगमगाहट थी, जिसे वह छड़ी के सहारे संतुलित कर रहे थे । शायद ८० साल की आयु पार करने पर घुटनों में होने वाली तकलीफ का असर था । मैंने अपना परिचय दिया, तो आत्मीयता से ड्राइंगरूम में ले गए और कुरसी पर बैठने को कह खुद भी बैठ गए ।
मैंने बात शुरू की, तो बोले, 'अब कम सुनाई देता है । जरा जोर से बोलना। बातें भी भूल जाता हूं । यह कहते हुए उनके चेहरे पर पीड़ा के भाव आ गए ।
तभी उनका पौत्र हलवे की प्लेट रख गया। भारत जी बोले, 'पहले प्रसाद ग्रहण करो, फिर बात करते हैं । कुछ देर बाद बोले, अब यही मेरा कमरा है । सारा समय यहीं बीतता है । जब कवि सम्मेलनों से अच्छी आय हो रही थी, तब यह मकान बनवा लिया था ।
मैंने कहा, आपकी कविता राम की जल समाधि की मैंने बड़ी तारीफ सुनी है । उसकी कुछ पंक्तियां सुनाइए। भारत जी की आंखों में चमक आ गई । बोले, राम की जल समाधि सुनकर महादेïवी वर्मा ने कहा था कि इस कविता से राम पर लगे सारे आक्षेप धुल गए हैं । मुंबई में एक कार्यक्रम में इस कविता को सुनकर धर्मवीर भारती ने गले लगा लिया था । भारती जी ने कहा, 'भारत भूषण आपको नहीं पता कि आपने कितनी बड़ी कविता लिखी है । तब पुष्पा जी भी उनके साथ थीं । ये मेरे लिए गौरव के ऐसे पल थे, जिन्हें मैं कभी भुला नहीं सकता । स्मरण करने की मुद्रा में बोले, इस कविता की शुरुआत ऐसे होती है- पश्चिम से ढलका सूर्य/ उठा वंशज सरयू की रेती से/ हारा-हारा रीता-रीता/ निशब्द धरा, निशब्द व्योम, निशब्द अधर/ पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता ।
भारत भूषण जी के गीतों में जहां प्रेम की व्याकुलता है, वहीं मिलन न होने से उपजी मायूसी का भाव भी । उनकी तसवीर अधूरी रहनी थी कविता भी काफी चर्चित हुई, शायद मैंने गत जनमों में अधबने नीड़ तोड़े होंगे/ चातक का स्वर सुनने वाले बादल वापस मोड़े होंगे/ ऐसा अपराध हुआ होगा फिर जिसकी क्षमा नहीं मिलती/ तितली के पर नोचे होंगे, हिरनी के दृग फोड़े होंगे/ अनगिनत कुछ कर्ज चुकाने थे इसलिए जिंदगी भर मेरे/ तन को बेचैन भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी ।
आठ जुलाई १९२९ को जन्मे भारत भूषण का पूरा जीवन मेरठ में बीता। बीएबी इंटर कॉलेज, मेरठ में वह लंबे समय तक अध्यापक रहे और एक लोकप्रिय कवि के रूप में उन्होंने पूरे देश में अपनी पहचान बनाई । भारत जी सूक्ष्म संवेदनाओं को विराट अभिव्यक्ति देने वाले सामथ्र्यवान गीतकार हैं । उनके अब तक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं- सागर की सीप, ये असंगति, मेरे चुनींदा गीत ।
(अमर उजाला हिंदी दैनिक के दो अक्टूबर २००९ के अंक में आखर पेज पर प्रकाशित)

Wednesday, August 12, 2009

आंसू अगर बिकते कहीं,होता बहुत धनवान मैं

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
'हर झुर्रियों से झांकते सौ-सौ दिवाकर ओज के, अपना सफर पूरा किया, अब पंख किरणों के थके।Ó 'राजस्थान दर्पणÓ में प्रकाशित इन पंक्तियों के रचयिता मेरठ के साहित्यकार और पत्रकार ८० वर्षीय विष्णु खन्ना को गए एक वर्ष बीत गया । उन्होंने १० अगस्त ०९ को ङ्क्षजदगी के सफर को विराम दिया था । मेरठ के जनजीवन की गहरी समझ रखने वाले विष्णु खन्ना इस क्रांतिधरा की विविध घटनाओं के साक्षी रहे । यह उनका मेरठ के प्रति लगाव ही था कि लंबे समय तक नौकरी दिल्ली में और निवास मेरठ में किया । 'जो भोगा सो गायाÓ कृति के माध्यम से मेरठ की गीत काव्य परंपरा की श्रीवृद्धि करके हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले विष्णुजी साहित्य के ऐसे साधक थे, जिनमें अंत समय तक रचनाधर्मिता के प्रति अद्भुत उत्साह बना रहा । स्वाथ्य खराब होने के बावजूद वह लेखन कार्य में जुटे रहे । उनके लगभग १५० गीत हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए । उन्होंने जीवन के भोगे हुए यथार्थ, विडंबनाओं और दर्शन को गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया । वास्तव में जीवन के यथार्थ को बहुत गहनता से विष्णुजी ने अनुभव किया और उसमें समाहित पीड़ा को पूरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त भी किया। उनकी पंक्तियां-'आंसू अगर बिकते कहीं, होता बहुत धनवान मैं, मोती सभी कहते जिन्हें, किसने खरीदा कब इन्हेंÓ, उनके अंर्तमन की पीड़ा को रेखांकित करती हैं । इसी वर्ष प्रकाशित उनकी पुस्तक 'राजस्थान दर्पणÓ कुछ लीक से हटकर थी । इसमें प्रकाशित जीवंत चित्रों पर आधारित विष्णुजी की काव्य पंक्तियों ने जहां राजस्थान के गौरवशाली अतीत के झरोखे खोले हैं, वहीं वर्तमान के अंधेरे-उजाले को भी उकेरा है । अनेक काव्य मंचों पर विष्णुजी के गीत गूंजे । उन्होंने जीवन के विविध पक्षों के काव्य में उकेरा । आधुनिकताबोध से संपृक्त उनकी ये पंक्तियां द्रष्टव्य हैं- 'फाइल जैसी कटी जिंदगी, कभी इधर से कभी उधर से, कुर्सी-कुर्सी आते जाते, टिप्पणियों का बोझ उठाते, कागज जर्जर हुए उम्र के तार-तार हो कटी जिंदगी । Ó समकालीन जाने-माने कवियों से विष्णुजी की बड़ी आत्मीयता रही ।
दरअसल विष्णुजी की नौकरी की शुरुआत आकाशवाणी जयपुर से ही हुई । तब उन्होंने राजस्थान की जिंदगी को बहुत करीब से देखा । सन् १९८६ में असिस्टेंट प्रोड्यूसर पद से सेवानिवृत होने के बाद भी वह आकाशवाणी और दूरदर्शन के कार्यक्रमों में भाग लेते रहे । जयपुर के बाद उनकी तैनाती आकाशवाणी दिल्ली में हुई । आकाशवाणी से फौजियों के लिए प्रसारित कार्यक्रम को जयमाला नाम विष्णु खन्ना ने ही दिया था । बाद में यह कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हुआ। आकाशवाणी में ही वह प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन के संपर्क में आए । उन्हें १९६६ में आकाशवाणी में पदोन्नति मिली ।
विष्णुजी को घूमना बहुत पसंद था । मौका मिलते ही वह संस्कृति और इतिहास से जुड़े स्थलों की यात्रा किया करते थे । उन्होंने अपनी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के चलते देश के अनेक महत्वपूर्ण स्थलों की संस्कृति और परंपराओं को शब्दबद्ध कर पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से जनता तक पहुंचाया । अंतिम दिनों में भी उन्होंने 'अपने-अपने अलबमÓ नामक पुस्तक लिखी जिसमें पर्यटन के माध्यम से उपजे वैचारिक और सांस्कृतिक ज्ञान का समावेश किया गया । यह पुस्तक अभी प्रकाशनाधीन है । विष्णु खन्ना की सर्वाधिक चर्चित पुस्तक है 'दिल्ली बोलती है।Ó प्रथम पुरुष के रूप में १९७५ में प्रकाशित इस पुस्तक में दिल्ली के विभिन्न पक्षों को उभारा गया है । 'मैं मानती हूं मेरे नए-पुराने बोल ही कोलाहल को निरंतर जन्म देते रहे हैं । अब मैं इतना बोल चुकी हूं कि मेरे आंगन में सिर्फ कोलाहल रह गया है। आज जब खुद मुझे अपनी आवाज सुनाई नहीं पड़ रही, आप मेरी आवाज क्या सुनेंगे ।Ó दिल्ली के बारे में उनकी पुस्तक के यह अंश आज भी पूरी तरह प्रासांगिक हैं ।
विष्णु खन्ना को अनेक मंचों पर सम्मानित किया गया । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने वर्ष २००५ के लिए सृजनात्मक लेखन और खोजी पत्रकारिता के लिए आचार्य महावीर प्रसाद द्विेदी पुरस्कार प्रदान किया। १५ सितंबर २००६ को लखनऊ में आयोजित समारोह में उन्हें पुरस्कृत किया गया। वास्तव में मेरठ कभी विष्णु खन्ना के योगदान को नहीं भुला पाएगा ।