Saturday, November 21, 2009

कौरवी लोक साहित्य का विश्लेषण

- अशोक प्रियरंजन
हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय रूप में खड़ी बोली ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई है । खड़ी बोली का आधार है मेरठ, सहारनपुर, बुलंदशहर और दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली कौरवी । खड़ी बोली का तो तेजी से विकास हुआ लेकिन विविध कारणों से कौरवी सिर्फ बोलने तक सीमित होकर रह गई । कौरवी में राग-रागनियां, आल्हा, लोकगाथाएं, स्वांग, कहानियां, होली, भजन, धार्मिक और सामाजिक गीत लिखे गए लेकिन अधिकांश वाचिक परंपरा तक ही सीमित होकर रह गए । प्रकाशित सामग्री का अभाव इस बोली के विकास में बड़ी बाधा बना रहा । इस पुस्तक में कौरवी के क्षेत्र, भाषागत रूप और साहित्य की सम्यक विवेचना तो की ही गई है साथ ही विभिन्न विधाओं की प्रमुख रचनाओं को भी प्रस्तुत किया गया है । ग्यारह अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक में कौरवी बोली के विविध पक्षों का शोधपरक अनुशीलन किया गया है । कौरवी के क्षेत्र, प्रमुख रचनाकार, लोक साहित्य के रूप यथा लावनी, नौटंकी, झूलना, ख्याल आदि का सोदाहरण विश्लेषण किया गया है । कौरवी लोककथाओं पर भी प्रकाश डाला गया है । मेरठ परिक्षेत्र के जनकवियों के काव्य में सामाजिक, राजनीतिक जागृति के स्वरों को भी रेखांकित किया गया है । परिशिष्ट में प्रस्तुत सामग्री की अपनी अलग उपादेयता है । वस्तुत: डॉ. नवीन चंद्र लोहनी की यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इसमें कौरवी भाषा और साहित्य के व्यापक सरोकारों को रेखांकित करते हुए उसके विविध पक्षों का शोधपरक गहन विश्लेषण, तार्किक विवेचन किया गया है और सामायिक संदर्भों में उसकी महत्ता को चिह्नित किया गया है ।
कौरवी लोक साहित्य, लेखक: डॉ. नवीन चंद्र लोहनी, सहयोगी-डॉ. रवींद्र कुमार, सीमा शर्मा, प्रकाशक : भावना प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य : २५० रुपये ।

(अमर उजाला, मेरठ के २० नवंबर के अंक में प्रकाशित)

1 comment:

superbghazals said...

hindi saahitya ko aur bhi samriddh karne ke prayaas karnne waale vyaktitvon mein Dr.Lohni ka naam gina jaana atyant swabhaavik hai.unki pustak ki nihaayat khoobsoorat sameeksha hetu aapko bahut-bahut badhaai---rajan swami